45 साल बाद छत्तीसगढ़ से लौटा माँ चुन्नी देवी का बेटा, SIR बना बिछड़ों का सहारा: राजस्थान
राजस्थान निर्वाचन विभाग
मतदाता सूची को त्रुटिहीन बनाने के लिए चलाए जा रहे विशेष सघन पुनरीक्षण (SIR) अभियान में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। 4 नवंबर से शुरू हुई घर-घर जाकर मतदाता मैपिंग की प्रक्रिया में राज्य ने अपने 78 प्रतिशत मतदाताओं का विवरण सफलतापूर्वक दर्ज कर लिया है। इस अभियान की सफलता का प्रमाण यह है कि राज्य के 9,000 से अधिक मतदान केंद्रों पर यह कार्य शत-प्रतिशत पूरा हो चुका है। मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवीन महाजन ने बताया कि पिछले नौ दिनों में यह मैपिंग प्रतिशत 70 प्रतिशत से बढ़कर 78 प्रतिशत तक पहुँच गया है, जो अभियान की तीव्र गति और जमीनी स्तर पर बूथ लेवल अधिकारियों (BLOs) की मेहनत को दर्शाता है।
(SIR) अभियान का चमत्कारिक मोड़
पूरे देश में जहाँ अनेक राजनीतिक दल विशेष सघन पुनरीक्षण (SIR) अभियान पर सवाल उठा रहे हैं और विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, वहीं राजस्थान के भीलवाड़ा से सामने आए एक मानवीय मामले ने इस चुनावी प्रक्रिया को एक चमत्कारिक मोड़ दे दिया है। भीलवाड़ा जिले के आसिंद तहसील के सूरज गाँव में, SIR सत्यापन ड्राइव की बदौलत एक माँ को उसका 45 साल पहले गुम हुआ बेटा वापस मिल गया। 1980 में घर से लापता हुआ उदय सिंह, जो छत्तीसगढ़ में रह रहा था, आखिरकार बुधवार शाम को अपने गाँव लौटा। यह घटना न केवल इस अभियान की विश्वसनीयता को बढ़ाती है, बल्कि यह भी साबित करती है कि सरकारी प्रक्रियाएँ कभी-कभी जीवन को एक अप्रत्याशित और सुखद मोड़ दे सकती हैं।
आखिरकार घर लौट आया
सूरज गाँव में जब उदय सिंह वापस आए, तो यह पल सभी के लिए भावनात्मक रूप से बहुत भारी था। उनकी माँ, चुन्नी देवी रावत, उन्हें देखकर फूट-फूट कर रो पड़ीं, क्योंकि उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि जिस बेटे की तलाश में उन्होंने लगभग तीन दशक गुजार दिए थे, वह आखिरकार घर लौट आया है। उदय सिंह का परिवार 45 साल से अपने लापता बच्चे को ढूंढ रहा था। उदय सिंह ने छत्तीसगढ़ में एक निजी कंपनी में गार्ड के रूप में काम किया, जहाँ एक सड़क दुर्घटना में उन्हें सिर में गंभीर चोट लगी थी। इस चोट ने उनकी याददाश्त मिटा दी थी, जिसके कारण वह अपने घर या परिवार को याद नहीं कर पा रहे थे।
सत्यापन प्रक्रिया के दौरान
जब SIR अभियान शुरू हुआ, तो उदय सिंह दस्तावेजों को लेकर उत्सुक हुए। इस दौरान, उन्हें धुंधला ही सही, लेकिन अपने गाँव का नाम, सूरज, और अपनी जाति याद आई। बुधवार को, वह वोटर फॉर्म के बारे में पूछताछ करने के लिए सूरज गाँव के एक स्कूल पहुँचे। सत्यापन प्रक्रिया के दौरान, वहाँ मौजूद एक शिक्षक को कुछ संदेह हुआ और उन्होंने तत्काल उनके परिवार को इसकी सूचना दी। 45 साल बाद उन्हें पहचानना मुश्किल था, लेकिन घर और परिजनों को देखकर शायद उनकी याददाश्त कुछ वापस आई जिसके चलते उदय सिंह ने बचपन की कहानियाँ और व्यक्तिगत पारिवारिक यादें साझा कीं, जिनसे धीरे-धीरे परिवार को यकीन हो गया।
पहचान के साथ लंबी खोज समाप्त
परिजनों को अंतिम पुष्टि तब हुई जब उनकी माँ चुन्नी देवी रावत ने उनके माथे और छाती पर पुराने घावों के निशान पहचाने। इस पहचान के साथ ही उनकी लंबी खोज समाप्त हो गई। उदय सिंह की वापसी की खबर फैलते ही, गाँव में जश्न का माहौल बन गया। गाँव के लोग और दूर के रिश्तेदार उनसे मिलने के लिए उमड़ पड़े, और मात्र 150 घरों वाला पूरा गाँव उत्सव से भर गया। उदय सिंह का स्वागत एक दूल्हे की तरह किया गया; उन्हें घोड़ी पर बिठाया गया और उनकी वापसी को चिह्नित करने के लिए पारंपरिक बिंदोरी (जुलूस) निकाला गया, जिसमें ढोल और डीजे का प्रयोग किया गया।
























